Bihar Elections 2025: चुनाव आयोग ने 6 अक्टूबर को बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। दो चरणों में होने वाले इस चुनाव में पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर और दूसरे चरण की 11 नवंबर को होगी। 14 नवंबर को मतगणना होगी। सत्तारूढ़ जदयू-भाजपा (NDA) गठबंधन और राजद-कांग्रेस (महागठबंधन) के बीच इस बार कड़ी टक्कर की उम्मीद है। लेकिन बिहार की राजनीति की असली कसौटी हमेशा से जातीय समीकरण (Caste Equation) ही रही है।
बिहार में क्यों अहम है जातियों का गणित
बिहार की राजनीति जातियों के इर्द-गिर्द घूमती है। यहां कोई भी पार्टी केवल एक जाति पर निर्भर होकर सत्ता में नहीं आ सकती। अति पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलित जैसे बिखरे हुए समूहों को साथ लाना जीत की कुंजी होती है। साथ ही, हर दल अपने कोर वोट बैंक — जैसे RJD के लिए एम-वाई (मुस्लिम-यादव) और बीजेपी के लिए सवर्ण वर्ग — को एकजुट रखने में जुटा रहता है।
यादव वोट बैंक (14.3%): RJD की रीढ़
बिहार में यादव समुदाय की आबादी लगभग 14.3% है। यह वर्ग दशकों से राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का सबसे मजबूत आधार रहा है। लालू प्रसाद यादव से लेकर तेजस्वी यादव तक, यादव मतदाता इस पार्टी से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं।
यादव और मुस्लिम समुदाय के गठजोड़ को “M-Y समीकरण” कहा जाता है, जो महागठबंधन को कई सीटों पर निर्णायक बढ़त देता है। यह वोट RJD के सहयोगी दलों तक भी आसानी से ट्रांसफर हो जाता है।
सवर्ण वोट बैंक (15.5%): बीजेपी की मजबूती
ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ – ये चार सवर्ण जातियां मिलकर बिहार की आबादी का लगभग 15.5% हिस्सा हैं। आजादी के बाद यह वर्ग लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहा, लेकिन 1990 के दशक में जब OBC राजनीति ने जोर पकड़ा, तो सवर्ण समुदाय ने बीजेपी का दामन थाम लिया।
आज सवर्ण वर्ग पूरी तरह से भाजपा-NDA गठबंधन के साथ खड़ा है और चुनावी रणनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।
मुस्लिम वोट बैंक (17.7%): निर्णायक अल्पसंख्यक
बिहार की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की भागीदारी करीब 17.7% है। यह वोट बैंक लगभग हर चुनाव में एकजुट होकर मतदान करता है। पारंपरिक रूप से मुस्लिम मतदाता RJD-कांग्रेस महागठबंधन के साथ रहे हैं।
हालांकि 2020 में AIMIM ने सीमांचल क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया था और पांच सीटें जीती थीं, जिससे महागठबंधन को नुकसान हुआ। इस बार RJD की कोशिश है कि मुस्लिम वोटों में कोई सेंध न लगे।
लव-कुश समीकरण (7.1%): नीतीश कुमार की ढाल
कुर्मी (2.8%) और कुशवाहा (4.2%) जातियों का गठजोड़ जिसे लव-कुश समीकरण कहा जाता है, बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।
नीतीश कुमार (कुर्मी) ने इस समीकरण को मजबूती से साधकर कई बार सत्ता में वापसी की। उनके साथ धानुक (2.1%) जैसी जातियां भी जुड़ी हैं।
दूसरी ओर, सम्राट चौधरी (कुशवाहा समुदाय) को बीजेपी का उपमुख्यमंत्री बनाना इसी वोट बैंक को साधने की रणनीति मानी जा रही है।

महादलित और अति पिछड़ा वर्ग: किंगमेकर की भूमिका
बिहार में EBC और महादलित समुदाय की आबादी लगभग 30% से अधिक है। ये समूह किसी एक पार्टी के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़े हैं। जो भी दल इन्हें सही प्रतिनिधित्व और नेतृत्व देता है, वही सत्ता की कुर्सी तक पहुंचता है।
NDA इन समुदायों को नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय मॉडल से जोड़ने की कोशिश कर रहा है, जबकि RJD इन्हें तेजस्वी यादव के युवा नेतृत्व से जोड़ने की रणनीति पर है।
नतीजा: जातीय संतुलन ही तय करेगा बिहार की दिशा
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जातीय समीकरण एक बार फिर से सबसे बड़ा कारक होंगे। हर पार्टी को अपने कोर वोट बैंक को बनाए रखते हुए नए सामाजिक समूहों को जोड़ना होगा।
कौन बनाएगा सटीक सामाजिक संतुलन — यह तय करेगा कि 14 नवंबर को सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी।
#BiharElections2025 #BiharPolitics #CasteEquation #BiharNews #RJD #BJP #NitishKumar #TejashwiYadav #Election2025 #BiharAssemblyElection #MYEquation #LoveKushEquation #Mahagathbandhan #NDA





